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जम्मू-कश्मीर विधानसभा में पूर्ण राज्य की बहाली का प्रस्ताव पास: केंद्र शासित प्रदेश और राज्य में क्या अंतर है?

जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने का प्रस्ताव पास किया। जानिए केंद्र शासित प्रदेश और पूर्ण राज्य में क्या अंतर है।

जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने 28 सितंबर 2026 को केंद्र सरकार से जम्मू-कश्मीर को जल्द से जल्द पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग वाला प्रस्ताव पारित कर दिया। यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है—विधानसभा ने कोई ऐसा कानून या बिल पास नहीं किया है जिससे जम्मू-कश्मीर तत्काल राज्य बन गया हो। सदन ने एक प्रस्ताव यानी Resolution पारित किया है, जिसे केंद्र सरकार के पास भेजा जाना है। (आकाशवाणी समाचार)

मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने यह प्रस्ताव 25 सितंबर 2026 को विधानसभा में पेश किया था। प्रस्ताव के मूल पाठ में केंद्र सरकार से जम्मू-कश्मीर को “तत्काल और शीघ्र पूर्ण राज्य का दर्जा” बहाल करने की मांग की गई और इसे भारत सरकार को भेजने की बात कही गई। 28 सितंबर को चर्चा के बाद इसे ध्वनि मत से पारित किया गया। भाजपा विधायक मतदान से पहले सदन से वॉकआउट कर गए थे। (The New Indian Express)

पहले एक सुधार: यह ‘बिल’ नहीं, ‘प्रस्ताव’ है

इस खबर को समझने के लिए बिल और प्रस्ताव का अंतर जानना जरूरी है।

बिल यानी विधेयक उस मसौदे को कहा जाता है, जो विधायी प्रक्रिया पूरी करने और आवश्यक मंजूरी मिलने के बाद कानून बन सकता है। इसके विपरीत विधानसभा का यह प्रस्ताव केंद्र सरकार से एक राजनीतिक और संवैधानिक मांग करता है।

इसलिए यह कहना कि “जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य बनाने वाला बिल विधानसभा ने पास कर दिया” सही नहीं होगा।

सही वाक्य होगा:

“जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग वाला प्रस्ताव पारित किया है।”

प्रस्ताव पास होने के बाद भी जम्मू-कश्मीर अभी केंद्र शासित प्रदेश ही है। केंद्रीय गृह मंत्रालय की मौजूदा जानकारी भी जम्मू-कश्मीर को विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेश बताती है। (केंद्रीय गृह मंत्रालय)

प्रस्ताव में क्या कहा गया है?

रिपोर्ट किए गए मूल प्रस्ताव में 26 जून 2000 और 6 नवंबर 2024 को विधानसभा में पारित पुराने प्रस्तावों का उल्लेख करते हुए केंद्र सरकार से जम्मू-कश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा तत्काल बहाल करने की मांग की गई है। साथ ही प्रस्ताव को भारत सरकार के पास भेजने की बात कही गई है। (NDTV)

विधानसभा सचिवालय ने इस प्रस्ताव पर 10 संशोधन प्रस्तावों की सूची भी जारी की थी। इनमें कई विधायकों ने अनुच्छेद 370, अनुच्छेद 35A और अगस्त 2019 से पहले की संवैधानिक स्थिति से संबंधित बातें जोड़ने का प्रस्ताव रखा था। विधानसभा के आधिकारिक दस्तावेज में ये संशोधन दर्ज हैं। (J&K Legislative Assembly दस्तावेज)

इस मुद्दे पर भाजपा ने प्रस्ताव में पुराने प्रस्तावों के संदर्भ को लेकर विरोध किया। विधानसभा में विपक्ष के नेता सुनील शर्मा ने कहा कि भाजपा राज्य के दर्जे की बहाली के खिलाफ नहीं है, लेकिन अगस्त 2019 से पहले की विशेष संवैधानिक स्थिति से जुड़े संदर्भों पर उसे आपत्ति है। (The Indian Express)

जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश कब बना?

2019 से पहले जम्मू-कश्मीर भारत का एक राज्य था।

संसद ने जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 पारित किया। इसके तहत पुराने जम्मू-कश्मीर राज्य का पुनर्गठन कर 31 अक्टूबर 2019 से दो केंद्र शासित प्रदेश बनाए गए:

  • जम्मू-कश्मीर — विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेश
  • लद्दाख — बिना विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेश

केंद्रीय गृह मंत्रालय और India Code पर उपलब्ध जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम में इसकी पुष्टि होती है। (केंद्रीय गृह मंत्रालय)

इसका अर्थ यह है कि जम्मू-कश्मीर में आज निर्वाचित विधानसभा और मुख्यमंत्री तो हैं, लेकिन उसकी सरकार के अधिकार किसी सामान्य पूर्ण राज्य की सरकार के बराबर नहीं हैं।

केंद्र शासित प्रदेश और पूर्ण राज्य में क्या अंतर है?

भारत के संविधान में राज्य और केंद्र शासित प्रदेश की प्रशासनिक तथा विधायी स्थिति अलग है।

विषय सामान्य पूर्ण राज्य जम्मू-कश्मीर की मौजूदा UT व्यवस्था
संवैधानिक स्थिति भारत का राज्य केंद्र शासित प्रदेश
संवैधानिक प्रमुख राज्यपाल उपराज्यपाल
प्रशासन निर्वाचित राज्य सरकार की अपेक्षाकृत व्यापक भूमिका केंद्र और उपराज्यपाल की अधिक भूमिका
विधानसभा होती है जम्मू-कश्मीर में भी है
पुलिस सामान्यतः राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र का विषय J&K विधानसभा पुलिस पर कानून नहीं बना सकती
Public Order सामान्यतः राज्य का विषय J&K विधानसभा के अधिकार से बाहर
संसद की भूमिका राज्य सूची में सामान्यतः सीमित, संविधान में बताए अपवादों के अधीन संसद J&K के लिए किसी भी विषय पर कानून बना सकती है
निर्वाचित सरकार के अधिकार राज्य सूची के विषयों पर व्यापक पुनर्गठन अधिनियम से सीमित

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 239 कहता है कि केंद्र शासित प्रदेशों का प्रशासन राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त प्रशासक के माध्यम से किया जाता है। जम्मू-कश्मीर के मामले में इस पद को उपराज्यपाल कहा जाता है। (भारत का संविधान)

इसके विपरीत राज्यों के लिए संविधान के भाग VI में अलग व्यवस्था है। अनुच्छेद 153 प्रत्येक राज्य के लिए राज्यपाल की व्यवस्था करता है और अनुच्छेद 154 राज्य की कार्यपालिका शक्ति से संबंधित है। (विधायी विभाग)

सबसे बड़ा अंतर: पुलिस और कानून-व्यवस्था

जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में सबसे आसानी से समझ आने वाला अंतर पुलिस और कानून-व्यवस्था का है।

जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 की धारा 32 के अनुसार जम्मू-कश्मीर विधानसभा राज्य सूची और समवर्ती सूची के कई विषयों पर कानून बना सकती है, लेकिन राज्य सूची की दो महत्वपूर्ण प्रविष्टियों—

  • Public Order यानी सार्वजनिक व्यवस्था
  • Police यानी पुलिस

पर विधानसभा को कानून बनाने का अधिकार नहीं है। (India Code)

यानी जम्मू-कश्मीर में मुख्यमंत्री और विधानसभा होने के बावजूद पुलिस और सार्वजनिक व्यवस्था के मामले किसी सामान्य राज्य जैसी राज्य सरकार की विधायी शक्ति के अंतर्गत नहीं आते।

इसके अलावा मौजूदा कानून स्पष्ट करता है कि जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश से संबंधित किसी भी विषय पर कानून बनाने की संसद की शक्ति बनी रहती है। (India Code)

अगर जम्मू-कश्मीर फिर राज्य बना तो क्या बदलेगा?

यदि जम्मू-कश्मीर को सामान्य राज्य की संवैधानिक व्यवस्था के तहत पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाता है, तो सबसे बड़ा बदलाव केंद्र और निर्वाचित राज्य सरकार के बीच शक्तियों के बंटवारे में होगा।

सामान्य राज्य व्यवस्था में पुलिस, सार्वजनिक व्यवस्था, स्थानीय प्रशासन और राज्य सूची के कई विषय राज्य सरकार और राज्य विधानसभा के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद की प्रशासन पर भूमिका मौजूदा केंद्र शासित प्रदेश व्यवस्था की तुलना में व्यापक होती है।

हालांकि जम्मू-कश्मीर को भविष्य में राज्य बनाने वाले कानून का अंतिम स्वरूप महत्वपूर्ण होगा। इसलिए यह अभी निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि भविष्य के हर प्रशासनिक प्रावधान का स्वरूप क्या होगा।

क्या विधानसभा के प्रस्ताव से जम्मू-कश्मीर अब राज्य बन जाएगा?

नहीं।

इस प्रस्ताव के पारित होने से जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक स्थिति अपने आप नहीं बदलती।

संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के गठन और राज्यों/क्षेत्रों की सीमाओं तथा स्थिति से जुड़े बदलाव करने की विधायी शक्ति संसद के पास है। ऐसे विधेयक को संसद में पेश करने के लिए राष्ट्रपति की सिफारिश भी आवश्यक होती है। (भारत का संविधान)

इसलिए विधानसभा का प्रस्ताव केंद्र सरकार से कार्रवाई की मांग है। वास्तविक राज्य का दर्जा बहाल करने के लिए केंद्र और संसद के स्तर पर कानूनी प्रक्रिया आवश्यक होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य के दर्जे को लेकर क्या कहा था?

दिसंबर 2023 में अनुच्छेद 370 से संबंधित मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल ने कहा था कि जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा बहाल किया जाएगा और केंद्र शासित प्रदेश की स्थिति अस्थायी है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने 11 दिसंबर 2023 के फैसले में कहा था कि जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा “at the earliest and as soon as possible”, यानी जल्द से जल्द बहाल किया जाना चाहिए। अदालत ने विधानसभा चुनाव कराने के लिए 30 सितंबर 2024 तक की समयसीमा भी दी थी। (सुप्रीम कोर्ट का फैसला)

सितंबर 2026 तक जम्मू-कश्मीर हालांकि अभी भी केंद्र शासित प्रदेश है। (केंद्रीय गृह मंत्रालय)

क्या पूर्ण राज्य का दर्जा मिलने का मतलब अनुच्छेद 370 भी वापस आ जाएगा?

नहीं, दोनों अलग मुद्दे हैं।

जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा बहाल करना और अनुच्छेद 370 या पूर्व की विशेष संवैधानिक व्यवस्था को बहाल करना कानूनी रूप से एक ही प्रक्रिया नहीं है।

किसी क्षेत्र को राज्य बनाया जा सकता है बिना उसे अनुच्छेद 370 जैसा पुराना विशेष दर्जा दिए।

इसी वजह से मौजूदा बहस में दोनों विषयों को अलग-अलग समझना जरूरी है। विधानसभा में कुछ विधायकों ने राज्य का दर्जा मांगने वाले प्रस्ताव में अनुच्छेद 370 और 35A के संदर्भ जोड़ने के लिए संशोधन दिए थे, जबकि भाजपा ने इसी तरह के संदर्भों पर आपत्ति जताई। (विधानसभा का आधिकारिक दस्तावेज)

आम नागरिक के लिए इसका क्या मतलब है?

साधारण भाषा में समझें तो केंद्र शासित प्रदेश में केंद्र सरकार की प्रशासनिक और विधायी भूमिका अपेक्षाकृत अधिक होती है, जबकि एक सामान्य राज्य में निर्वाचित मुख्यमंत्री, मंत्रिपरिषद और विधानसभा को राज्य से जुड़े विषयों पर अधिक अधिकार मिलते हैं।

जम्मू-कश्मीर एक खास स्थिति वाला केंद्र शासित प्रदेश है क्योंकि यहां विधानसभा और मुख्यमंत्री दोनों मौजूद हैं। इसके बावजूद पुलिस और सार्वजनिक व्यवस्था जैसे महत्वपूर्ण विषय निर्वाचित विधानसभा के अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं।

इसलिए जम्मू-कश्मीर में चल रही “पूर्ण राज्य का दर्जा” बहाल करने की मांग केवल नाम बदलने की मांग नहीं है। इसका मुख्य प्रश्न यह है कि निर्वाचित सरकार, उपराज्यपाल और केंद्र सरकार के बीच प्रशासनिक तथा विधायी शक्तियां किस प्रकार बंटी रहेंगी।

फिलहाल विधानसभा ने अपनी मांग पारित कर केंद्र सरकार तक भेजने का फैसला किया है। जम्मू-कश्मीर को वास्तव में राज्य का दर्जा कब और किन शर्तों पर मिलेगा, इसका निर्णय आगे की संवैधानिक और संसदीय प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।

स्रोत

जम्मू-कश्मीर विधानसभा की आधिकारिक NeVA वेबसाइट:
Jammu & Kashmir Legislative Assembly – NeVA

केंद्रीय गृह मंत्रालय — जम्मू-कश्मीर और लद्दाख मामलों का विभाग:
Ministry of Home Affairs – Jammu Kashmir and Ladakh Affairs

India Code — Jammu and Kashmir Reorganisation Act, 2019:
Jammu and Kashmir Reorganisation Act, 2019 PDF

भारत का संविधान — विधायी विभाग:
Constitution of India – Legislative Department

सुप्रीम कोर्ट का 11 दिसंबर 2023 का अनुच्छेद 370 फैसला:
Supreme Court Judgment – In Re Article 370

आकाशवाणी समाचार — 28 सितंबर 2026:
J&K Assembly Passes Resolution for Restoration of Statehood

The Indian Express — विधानसभा में राज्य के दर्जे पर बहस:
J&K Assembly passes resolution demanding full statehood

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